पति, सहेली और शक। Hindi kahani। Best Hindi story। हिन्दी कहानियाँ।
रात को जब सुनीता के साथ सिद्धार्थ लौटे, तो में अपने अंदर के गुस्से को रोक नहीं पायी, गुस्से में कहा, मुझे लगता है तुम्हारी पत्नी में नहीं यह है। Best hindi kahani ।Hindi kahani ।Hindi stories। हिन्दी कहानी।
सुनीता और मैं बचपन से एक-दूसरे की परछाईं थीं। स्कूल के दिनों में हम दोनों ने हर खुशी, हर गम साथ बांटे थे। माँ हमें जुड़वाँ बहनें कहतीं, और हम भी यही मानतीं कि हमारी लाइफ हमेशा एक-दूसरे से जुड़ी रहेंगी। यहाँ तक कि हम दोनों ने बचपन में यह तक सोच लिया था हम तो कि मैरिज भी एक ही घर में करेंगे, ताकि हमेशा साथ रह सकें।
समय बीता, कॉलेज खत्म हुआ, और फिर मेरी लाइफ में सिद्धार्थ आ गये । प्यार हुआ, शादी तय हुई, और सबसे पहले मैंने सुनीता को ही यह खबर सुनाई। वह बहुत खुश हुई।
मैंने सिद्धार्थ को पहले उससे मिलवाया, मुझे लगा था की उसे पसंद आ गया तो फिर में बेझिझक शादी के लिये हाँ कर सकती हूँ। और जब उसने उसे पसंद कर लिया, तब मैंने भी हाँ कर दी।
मैं चाहती थी कि मेरी सबसे अच्छी दोस्त और मेरा लाइफ पार्टनर एक-दूसरे के अच्छे फ्रेंड बन जाएँ। और हुआ भी वही। शादी के बाद भी सुनीता का हमारे घर में आना-जाना लगा रहा। सिद्धार्थ उससे खुलकर बातें करते, हँसी-मज़ाक करते, और मैं यह सब देखकर खुश होती थी।
पर मुझे क्या पता था की शादी के बाद सिद्धार्थ के आने के बाद मुझ में यह बदलाव हो जायेगा, धीरे-धीरे, वही हँसी-मज़ाक मेरे दिल में एक अजीब-सी चुभन पैदा करने लगे।
एक दिन, जब मैं रसोई में काम कर रही थी, तो ड्राइंग रूम से उनकी हँसी की आवाज़ आई। सिद्धार्थ और सुनीता किसी बात पर जोर-जोर से हँस रहे थे। मैं ठिठक गई। मेरी समझ में नहीं आया कि मुझे क्यों बुरा लग रहा है। आखिर वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी, फिर भी मेरे भीतर कुछ खटकने लगा था।
पहले तो मैंने इसे नज़रअंदाज़ किया, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, यह जलन गहराने लगी। जब भी मैं देखती कि सिद्धार्थ और सुनीता मज़ाक कर रहे हैं, पुरानी यादों में खो रहे हैं, तो मेरे अंदर एक अजीब-सी बेचैनी घर करने लगती। क्या वे एक-दूसरे के ज्यादा करीब आ रहे थे? क्या मैं उनके बीच फालतू महसूस कर रही थी? यह सब सोचकर मैं खुद पर झुंझला जाती।
फिर एक दिन सुनीता का जन्मदिन आया। उसने मुझे पार्टी में बुलाया, लेकिन मैंने बहाना बना दिया। मैं जानती थी कि सिद्धार्थ ज़रूर जाएगा।
रात को जब सुनीता के साथ सिद्धार्थ लौटे, तो में अपने अंदर के गुस्से को रोक नहीं पायी, गुस्से में कहा,
" मुझे लगता है तुम्हारी पत्नी में नहीं यह है, मुझसे ज्यादा तो तुम उसके साथ समय बिताते हो!"
वो दोनों मेरी यह बात सुनकर दंग रह गये। सुनीता को पता था की मैंने यह मज़ाक में नहीं कहा। वो बिना कुछ कहे चुप चाप वहाँ से चली गई।
सिद्धार्थ को मेरी बात से बहुत दुख हुआ। उन्होंने पहली बार मुझसे ऊँची आवाज़ में कहा,
"तुम्हें पता भी है तुम क्या कह रही हो? सुनीता तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त है!"
लेकिन उस वक्त मैं कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी। मुझे बस इतना लग रहा था कि सुनीता हमारे बीच आ रही है।
उस दिन के बाद, सुनीता ने हमारे घर आना बंद कर दिया। कोई फोन नहीं, कोई मैसेज नहीं। सिद्धार्थ कुछ दिन तक मुझसे नाराज रहे, फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया। मुझे लगा, मैंने सही किया। सुनीता का न आना मेरे लिए राहत की बात थी।
करीब एक साल बीत गया। मैं अपनी लाइफ में बिजी थी। इस दौरान ना कभी सिद्धार्थ नें, ना मैंने, कभी सुनीता के बारे में बात की, ना ही उसका फोन आता था।
फिर एक दिन अचानक दरवाजे की घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला, तो सामने सुनीता खड़ी थी। उसके हाथ में शादी का कार्ड था।
"में तेरी शादी में आई थी, तुझे बुलाना तो मेरा फर्ज़ था। लेकिन सच कहूँ, बुलाना नहीं चाहती थी। सिद्धार्थ ने कहा कि पुरानी बातें भूल जाओ, इसलिए आई हूँ।"
उसे अचानक देख कर में सन्न रह गई। कुछ कह नहीं पाई।
फिर उसने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"शायद अब शादी के बाद तुझे पता चले कि उस वक्त तू क्या सोच रही थी।"
वह जा रही थी लेकिन मैंने उसे रोका, और गले लगाया। उसने भी ज्यादा समय नहीं लगाया मानने में. मेरे साथ बैठ कर फिर बहुत बातें की।
अब उसकी शादी में खूब धमाल मचाने वाली हूँ। सुनीता नें और मेरे पति नें मुझे समझा। उन्हें लगा की ऐसी बातें किसी के मन में भी उठ सकती है। अगर हमें रिश्ते बचाने और निभाने होते है, एक दूसरे को अच्छे से समझना होता है। चाहे वो दोस्ती हो या प्यार।
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यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसके पात्र घटनाये स्थान नाम भी काल्पनिक है। इसका किसी के भी जीवन से मेल खाना महज एक सयोंग होगा। कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना है ना की किसी तरह की बातों का समर्थन करना है। कृपया इसे उसी तरह से लिया जाये। पाठक अपने विवेक का इस्तेमाल करें।