समय का खेल (short story ) - Hindi Emotional kahani.


समय का खेल (short story ) - Hindi Emotional kahani.

समय एक जैसा नहीं रहता। पैसो का घमंड टूटते वक्त नहीं लगता। इस बात को समझाती यह कहानी. Emotional story in hindi. Emotional kahani. hindi emotional kahani. Short stories.



शहर के सबसे पॉश इलाके में एक भव्य हवेली थी. ऊँची दीवारों से घिरी हुई, बड़े-बड़े दरवाजे और कई कमरों वाली यह हवेली कभी रौनक से भरी रहती थी. हर समय यहाँ मेहमानों का आना-जाना लगा रहता था. लेकिन समय के साथ सब बदल गया. अब यह हवेली वीरान हो चुकी थी. यहाँ सिर्फ एक बुजुर्ग रहते थे—श्रीकांत बाबू.

श्रीकांत बाबू कभी बहुत अमीर हुआ करते थे. उनके पास हर सुख-सुविधा थी, नौकर-चाकर थे, रिश्तेदार थे, दोस्त थे.लेकिन जब उम्र बढ़ी, तो एक-एक करके सबने उनसे दूरी बना ली. एक ही बेटा था जो असमय चला गया रिश्तेदारों ने पैसे और व्यापार लूट लिया और अपनी दुनिया बसा ली, और दोस्त भी समय के साथ चले गए. कभी जो हवेली हंसी-खुशी से गूंजती थी, अब वहाँ बस सन्नाटा था.

बुजुर्ग ने हवेली के कई कमरों को बंद कर दिया था, अब वह सिर्फ एक छोटे से कमरे में रहते थे. पुराने फर्नीचर, दीवारों पर जमी धूल और दरारें, छत से लटकता जाला इन सबने हवेली की वीरानी को और गहरा कर दिया था.
अचानक एक दस्तक

उस दिन दोपहर को अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. वर्षों बाद किसी ने इस घर का दरवाजा खटखटाया था.

श्रीकांत बाबू धीरे-धीरे चलते हुए दरवाजे तक पहुँचे और उसे खोला. बाहर एक नौजवान खड़ा था, सादा-सा कपड़ा पहने, विनम्रता से सिर झुकाए.

"नमस्ते बाबूजी," युवक ने आदर से कहा.

बुजुर्ग ने ध्यान से उसे देखा, लेकिन पहचान नहीं पाए.

"बेटा, तुम कौन हो?" श्रीकांत बाबू ने पूछा.

युवक ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, "बाबूजी, मेरे पिता आपके यहाँ नौकरी करते थे। बहुत साल पहले... मेरा नाम अर्जुन है।"

श्रीकांत बाबू के दिमाग में पुरानी यादें ताजा हो गईं.

"तुम्हारे पिता...? कौन थे वे?" उन्होंने सोचने की कोशिश की।

"जी, रामलाल। वे आपके यहाँ नौकर थे. लेकिन उन्होंने हमेशा हमें सिखाया कि आप हमारे मालिक नहीं, बल्कि हमारे संरक्षक हैं. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं इस शहर आ रहा हूँ, तो उन्होंने कहा कि आपको ज़रूर मिलूं."

श्रीकांत बाबू का दिल भर आया। रामलाल… वही रामलाल जिसने उनकी सेवा कई सालों तक की थी। जिसे वे हमेशा छोटा समझते थे, आज उसी के बेटे ने उन्हें याद रखा था।


बुजुर्ग ने अर्जुन को अंदर बुलाया। अर्जुन ने देखा कि हवेली की हालत बेहद खराब हो चुकी थी.वह यह देखकर दुखी हुआ कि जो इंसान कभी शान और ऐशो-आराम में जीता था, आज अकेलेपन और उदासी में डूबा हुआ था.

"बाबूजी, आप अकेले रहते हैं?" अर्जुन ने चिंता से पूछा।

श्रीकांत बाबू ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "हाँ बेटा, समय के साथ सब बदल गया.एक वक्त था जब यह घर गुलजार था. लेकिन धीरे-धीरे सब छूटता गया। दौलत थी, रुतबा था, इसलिए शायद रिश्ते सिर्फ दिखावे के थे। जब जरूरतें खत्म हो गईं, तो अपने भी दूर हो गए."

अर्जुन ने उनकी आँखों में नमी देखी। उसने धीरे से कहा, "बाबूजी, मेरे पिता कहते थे कि इंसानियत और प्रेम से बड़ा कुछ नहीं होता दौलत इंसान को कभी सच्चा सुख नहीं दे सकती."

श्रीकांत बाबू चुप हो गए। अर्जुन की बात उनके दिल को छू गई।

अर्जुन ने धीरे-धीरे बुजुर्ग की देखभाल शुरू कर दी.वह हर रोज आता, उनके लिए खाने-पीने की चीजें लाता, घर की सफाई करता और सबसे जरूरी बात—उनसे बातें करता.


समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता.दौलत, घमंड और शान-शौकत पलभर में मिट सकते हैं, लेकिन इंसानियत और अपनापन हमेशा बना रहता है. हमें कभी भी अपने हालात पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि वक्त बदलते देर नहीं लगती.

श्रीकांत बाबू की हवेली फिर से वैसी तो नहीं बनी, लेकिन उनके दिल का सन्नाटा खत्म हो गया था.अब वहाँ अर्जुन की हँसी और अपनेपन की गर्माहट थी.


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