25 साल का भाइयों का अहंकार - हिन्दी कहानी- Hindi kahani - Hindi Emotional kahani - Hindi kahaniyaa - Emotional story in Hindi.



बरसों की दूरियों और अहंकार को पीछे छोड़ते हुए, एक भाई अपने बड़े भाई से मिलने का साहस करता है. Best Hindi kahani - Hindi kahaniyaa - Hindi Emotional Story - kahaniyaa - Hindi Story- Hindi Stories.


25 साल का भाइयों का अहंकार - हिन्दी कहानी- Hindi kahani - Hindi Emotional kahani - Hindi kahaniyaa - Emotional story in Hindi.


रात गहरी हो चली थी। खिड़की से बाहर घनघोर बारिश हो रही थी। बूंदों की लगातार पड़ती आवाज़ जैसे किसी भूली-बिसरी याद को फिर से ज़िंदा कर रही थी। मैं


चुपचाप कुर्सी पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। सड़क पर एक छोटा-सा लड़का भाग रहा था, और उसका बड़ा भाई उसके सिर पर छाता ताने हुए उसके पीछे चल रहा था। बड़ा भाई खुद भीग रहा था, लेकिन छोटे को बारिश से बचा रहा था। यह दृश्य मेरी आँखों के सामने एक पुराने समय की परतें खोलने लगा।


यादें मन के किसी कोने में धूल खा रही थीं, लेकिन आज वे अचानक ज़िंदा हो गईं। मैं पचपन साल का हो चुका हूँ। मेरा बड़ा भाई मुझसे चार साल बड़ा है। बचपन में हम दोनों की दुनिया एक-दूसरे के बिना अधूरी थी।




साथ खेलते, लड़ते, फिर उसी जोश में गले भी लग जाते। माँ की मीठी डाँट हो या बाबूजी की सख़्ती, दोनों ने हमें कभी अलग नहीं किया। बचपन की वो निश्छल हंसी, वो तकरारें, वो साथ बिताए पल—सब कुछ जैसे किसी पुरानी किताब की तरह फिर से खुलने लगा। लेकिन फिर एक झगड़ा हुआ और सबकुछ बदल गया।


पच्चीस साल पहले की बात है। घर के भीतर एक ऐसी बहस हुई, जो धीरे-धीरे तकरार में बदल गई। उस समय यह सोचा भी नहीं था कि यह एक झगड़ा हमारे रिश्ते को इस हद तक दूर कर देगा कि हम एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगेंगे।


पहले बातचीत कम हुई, फिर बंद हो गई। त्योहारों पर भी बस औपचारिकता निभाने लगे। धीरे-धीरे, एक समय ऐसा आया जब हम दोनों के बीच सिर्फ़ ख़ामोशी बची। एक अनकहा अहंकार, एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई, जिसे पार करने की हिम्मत किसी ने नहीं की।


समय बीतता गया। परिवार के सदस्य समझाते रहे, रिश्तेदारों ने कोशिशें कीं, लेकिन जब दो दिल ही न बोलें तो कोई क्या कर सकता है? हर त्योहार, हर खुशी अधूरी लगती थी, लेकिन ज़िद ने हमें जकड़ रखा था। कई बार सोचा कि भाई से बात करूँ, लेकिन मन ने कहा—"क्यों झुकूं?" शायद वही सवाल उसके मन में भी रहा होगा।




पर आज कुछ अलग था। बारिश के उस दृश्य ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। क्या मेरा भाई भी कभी मेरे लिए ऐसा करता था? हाँ, न जाने कितनी बार! बचपन में स्कूल जाते समय वह मेरा बैग उठाकर चलता, बारिश में भीगते हुए मेरा हाथ थाम लेता, हर मुश्किल में मेरा सहारा बनता। और मैंने क्या किया? एक झगड़े को इतना बड़ा बना दिया कि वह मेरे रिश्ते से बड़ा हो गया।




मैंने तय कर लिया कि अब यह सब और नहीं। दिल ने कहा—"जो होना है, सो होना है, लेकिन मैं एक बार जाकर अपने भाई से माफ़ी माँगूंगा।" फिर चाहे वह मुझे माफ़ करे या न करे, कम से कम मैं इस बोझ से तो मुक्त हो जाऊँगा।




रात के अंधेरे में, तेज़ बारिश के बीच मैं घर से निकला। मेरे भाई का घर ज़्यादा दूर नहीं था, लेकिन वर्षों की दूरी तय करना आसान नहीं था। दिल धड़क रहा था। क्या होगा? वह मुझे देखेगा भी या नहीं? दरवाज़ा खोलेगा या अंदर जाने से मना कर देगा? मैं न जाने कितनी आशंकाओं से घिरा हुआ था, लेकिन कदम अपने आप आगे बढ़ते जा रहे थे।




जब मैं उसके दरवाज़े पर पहुँचा, तो देखा कि वह बाहर अपनी कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। यह वही पुरानी कुर्सी थी, जिस पर बैठकर वह अकसर शाम की चाय पिया करता था। मैंने गहरी साँस ली और आगे बढ़ा।



उसने अख़बार से नज़र उठाई और मुझे देखा। वह चौंका, जैसे यक़ीन ही न हुआ हो कि मैं उसके सामने खड़ा हूँ। मैंने बिना कुछ कहे झुककर उसके पैर छुए। मेरे आँसू ज़मीन पर गिरने लगे। शायद वह भी यही चाहता था। उसने झट से मुझे उठाया और गले से लगा लिया। पच्चीस साल का सारा गुबार बह निकला।




हम दोनों फूट-फूटकर रो पड़े। आसपास के लोग भी खड़े होकर देख रहे थे, लेकिन हमें किसी की परवाह नहीं थी। यह वो पल था, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यह माफ़ी का पल नहीं था, यह प्रेम के लौटने का पल था।




रात बीत गई। सुबह हम दोनों एक ही टेबल पर चाय पी रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में पीते थे। माँ हमेशा कहती थीं, "भाई से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता।" आज उनकी बात पूरी तरह समझ में आ गई थी।




ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। अहंकार आपको अपनों से दूर कर देता है, लेकिन जब तक साँसें चल रही हैं, तब तक रिश्तों को बचाया जा सकता है। माफ़ी माँगने वाला छोटा नहीं होता और माफ़ करने वाला कभी बड़ा नहीं होता।




उस रात मैंने प्रेम को चुना, नफरत को नहीं। और उस एक निर्णय ने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी।



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